श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1 क्या आप कभी ऐसे दौर से गुजरे हैं जहां आपको सच पता हो…
लेकिन फिर भी आप उसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हो? महाभारत का एक पात्र स्थिति को पूर्ण रूप से दिखाता है – धृतराष्ट्र I
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक केवल एक प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व, मोह और ममता का सजीव चित्रण है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध का निर्णय हो गया और दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गईं, तब राजा धृतराष्ट्र ने संजय से यह प्रश्न पूछा।

धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ 1 ॥
शब्दों का अर्थ:
- धर्मक्षेत्रे: धर्म की भूमि में।
- कुरुक्षेत्रे: कुरुक्षेत्र के मैदान में।
- समवेता: एकत्र हुए।
- युयुत्सवः: युद्ध की इच्छा वाले।
- मामकाः: मेरे पुत्रों ने।
- पाण्डवाः: पाण्डु के पुत्रों ने।
- किमकुर्वत: क्या किया।
- सञ्जय: हे संजय!
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 1: हिंदी अनुवाद:
धृतराष्ट्र ने कहा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
धृतराष्ट्र कौन थे?
कौरवों के नेत्रहीन पिता, राजा धृतराष्ट्र, जो शारीरिक रूप से युद्ध को देखने में असमर्थ हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 1: व्याकुलता का कारण
इस श्लोक में धृतराष्ट्र की मानसिक स्थिति के बारे में तीन मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- ‘मामकाः’ (मेरे पुत्र) का मोह: धृतराष्ट्र ने यहाँ “मेरे और पाण्डु के पुत्र” कहकर भेदभाव स्पष्ट कर दिया। यही वह ‘मोह’ था जिसने महाभारत के युद्ध की नींव रखी। एक राजा के लिए प्रजा और परिवार के सभी सदस्य समान होने चाहिए, लेकिन धृतराष्ट्र की दृष्टि केवल अपने पुत्रों पर टिकी थी।
- धर्मक्षेत्र का भय: कुरुक्षेत्र को ‘धर्मक्षेत्र’ कहा गया है। धृतराष्ट्र को भय था कि इस पवित्र भूमि के प्रभाव से कहीं उनके पुत्रों का अधर्मी मन बदल न जाए या पांडवों की धर्म-शक्ति और अधिक प्रबल न हो जाए।
- अनिश्चितता और घबराहट: युद्ध शुरू होने वाला था, संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। धृतराष्ट्र यह जानना चाहते थे कि युद्ध भूमि में सैन्य व्यूह रचना के बाद सबसे पहले क्या हलचल हुई।
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1: आज के जीवन में सीख
- भेदभाव का त्याग: धृतराष्ट्र की तरह ‘मेरा-तेरा’ करना ही संघर्ष का मूल कारण है।
कर्म की प्रधानता: जब स्थितियां नियंत्रण से बाहर हों, तो परिणाम की चिंता व्याकुलता बढ़ाती है।
सत्य की विजय: ‘धर्मक्षेत्र’ शब्द हमें याद दिलाता है कि अंततः जीत धर्म और सत्य की ही होती है।
निष्कर्ष
भगवद्गीता का यह पहला श्लोक हमें सिखाता है कि मोह और स्वार्थ इंसान की बुद्धि पर पर्दा डाल देते हैं। धृतराष्ट्र के इस प्रश्न से ही उस महान उपदेश की भूमिका तैयार होती है जो आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को देते हैं।
“अंधापन आँखों का नहीं… attachment का भी होता है।”
क्या आपने भी कभी attachment के कारण सही निर्णय लेने में कठिनाई महसूस की है?
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Good informative.