श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 के अनुसार राजसी भोजन के जलन और अशांति वाले प्रभाव का आध्यात्मिक चित्रण।

श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 : राजसी भोजन के 3 भयंकर नुकसान (Must Read)

Introduction

श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9

कटु अम्ल लवणात्युष्ण तीक्ष्ण रूक्ष विदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक 17.9 का हिंदी अनुवाद:

श्लोक का भावार्थ

राजसी भोजन के 7 प्रकार: क्या आप भी यही खा रहे हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक 17.9 में भगवान कृष्ण ने उन खाद्य पदार्थों की सूची दी है जो हमारे अंदर ‘रजोगुण’ (Passion/Restlessness) बढ़ाते हैं:

  • अत्यधिक कड़वा: जैसे बहुत कड़वी दवाइयाँ या अति-तीखा स्वाद।
  • अत्यधिक खट्टा: सिरका, बहुत खट्टा दही या अचार की अधिकता।
  • अत्यधिक नमकीन: चिप्स, नमकीन और प्रोसेस्ड फूड जिसमें सोडियम बहुत ज्यादा हो।
  • बहुत गर्म: तापमान में अत्यधिक गर्म या शरीर में गर्मी बढ़ाने वाला खाना।
  • अत्यधिक तीखा: लाल मिर्च और उत्तेजक मसालों का भारी उपयोग।
  • रूखा: बिना घी या तेल का सूखा खाना (Dry Snacks)।
  • जलन पैदा करने वाला: जो खाने के बाद सीने या पेट में एसिडिटी और जलन पैदा करे।

इसका हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है?

मॉडर्न लाइफस्टाइल और राजसी आहार

राजसी आहार के दुष्प्रभाव

जीवन में श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 का महत्व


सात्त्विक जीवन की ओर कदम

Conclusion

यह श्लोक राजसिक आहार के बारे में बताता है, जिसमें तीखा, खट्टा, नमकीन और अत्यधिक मसालेदार भोजन शामिल होता है, जो शरीर और मन के लिए हानिकारक माना गया है।

राजसिक आहार शरीर में असंतुलन पैदा करता है, जिससे रोग, तनाव, क्रोध और मानसिक अशांति बढ़ सकती है।

Q3. क्या राजसिक भोजन पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए?

पूरी तरह छोड़ना आवश्यक नहीं है, लेकिन संतुलन बनाए रखना जरूरी है और इसे सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए।

Q4. सात्त्विक आहार क्या होता है?

सात्त्विक आहार ताजा, हल्का, पौष्टिक और प्राकृतिक होता है जो शरीर और मन को शांति और ऊर्जा प्रदान करता है।

Q5. क्या गीता के अनुसार भोजन का मन पर प्रभाव पड़ता है?

हाँ, गीता के अनुसार भोजन हमारे स्वभाव, विचारों और मानसिक स्थिति को सीधे प्रभावित करता है।

Disclaimer

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