श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 के अनुसार राजसी भोजन के जलन और अशांति वाले प्रभाव का आध्यात्मिक चित्रण।

श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 : राजसी भोजन के 3 भयंकर नुकसान (Must Read)

कटु अम्ल लवणात्युष्ण तीक्ष्ण रूक्ष विदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥

यह श्लोक राजसिक आहार के बारे में बताता है, जिसमें तीखा, खट्टा, नमकीन और अत्यधिक मसालेदार भोजन शामिल होता है, जो शरीर और मन के लिए हानिकारक माना गया है।

राजसिक आहार शरीर में असंतुलन पैदा करता है, जिससे रोग, तनाव, क्रोध और मानसिक अशांति बढ़ सकती है।

Q3. क्या राजसिक भोजन पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए?

पूरी तरह छोड़ना आवश्यक नहीं है, लेकिन संतुलन बनाए रखना जरूरी है और इसे सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए।

Q4. सात्त्विक आहार क्या होता है?

सात्त्विक आहार ताजा, हल्का, पौष्टिक और प्राकृतिक होता है जो शरीर और मन को शांति और ऊर्जा प्रदान करता है।

Q5. क्या गीता के अनुसार भोजन का मन पर प्रभाव पड़ता है?

हाँ, गीता के अनुसार भोजन हमारे स्वभाव, विचारों और मानसिक स्थिति को सीधे प्रभावित करता है।

2 thoughts on “श्रीमद्भगवद गीता श्लोक 17.9 : राजसी भोजन के 3 भयंकर नुकसान (Must Read)”

  1. Pingback: Sattvik Aahar Kya Hai? (BG-17.8) – Health & Spiritual

  2. Pingback: भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 14: बदलते समय में मानसिक स्थिरता

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *